लखनऊ। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGIMS) ने एक बड़ी मेडिकल उपलब्धि हासिल की है। यहां एक दुर्लभ आनुवंशिक न्यूरोलॉजिकल बीमारी एक्स-लिंक्ड एड्रेनोलीकोडिस्ट्रोफी (X-ALD) का पहला सफल ट्रांसप्लांट हुआ है।

पांच साल के बच्चे का हैप्लो-आइडेंटिकल बोन मैरो ट्रांसप्लांट (Bone Marrow Transplant) किया गया है। इस जटिल ऑपरेशन में बच्चे के पिता ने ही डोनर की भूमिका निभाई। पिता के इस साहसिक कदम से बच्चे को नया जीवन मिला है। यह पूरा इलाज ‘नेशनल प्रोग्राम फॉर रेयर डिजीज़’ के तहत संपन्न हुआ।

उत्तर भारत में संस्थान का पहला सफल ट्रांसप्लांट

हिमैटोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सायन सिन्हा रॉय ने इस केस की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उत्तर भारत में X-ALD के लिए यह संस्थान का पहला सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट है।

यह कामयाबी हेमेटोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर राजेश कश्यप के नेतृत्व में मिली है। प्रत्यारोपण टीम में कई विशेषज्ञ शामिल रहे। इनमें मुख्य कंसल्टेंट डॉ. सायन सिन्हा रॉय, रेजिडेंट डॉ. लुइस, डॉ. चंद्रचूड़ और सीनियर टेक्निकल ऑफिसर मनोज कुमार सिंह शामिल थे। इसके अलावा मेडिकल जेनेटिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. कौशिक मंडल और डॉ. दीप्ति सक्सेना ने भी अहम भूमिका निभाई।

क्या है X-ALD बीमारी?

डॉ. रॉय ने बताया कि X-ALD एक बेहद दुर्लभ आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारी है। इसमें ABCD1 जीन में बदलाव आ जाता है। इस कारण शरीर में वेरी लॉन्ग-चेन फैटी एसिड (VLCFA) जमा होने लगते हैं।

इससे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की सुरक्षा करने वाली ‘मायलिन’ परत नष्ट होने लगती है। इसका सीधा असर एड्रिनल ग्रंथि पर भी पड़ता है। यह बीमारी मुख्य रूप से लड़कों में पाई जाती है। समय पर इलाज न मिलने से न्यूरोलॉजिकल क्षति बहुत तेजी से होती है।

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बोन मैरो ट्रांसप्लांट है एकमात्र प्रभावी उपचार

डॉ. रॉय ने स्पष्ट किया कि इस बीमारी की प्रगति को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (HSCT) या बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। यदि बीमारी के शुरुआती चरण में ही प्रत्यारोपण हो जाए, तो नतीजे सबसे अच्छे मिलते हैं। गंभीर लक्षण विकसित होने से पहले इस इलाज का शुरू होना जरूरी है।

एसजीपीजीआई की विशेषज्ञता का प्रमाण

यह सफलता दुर्लभ आनुवंशिक रोगों के उपचार में एसजीपीजीआई (SGPGI) की उन्नत ट्रांसप्लांट सेवाओं का एक बेहतरीन उदाहरण है। संस्थान के निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर आर के धीमन ने इस बड़ी कामयाबी पर पूरी टीम को बधाई दी।

उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि एसजीपीजीआई की उन्नत रोगी देखभाल और अनुसंधान के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह मल्टीडिसिप्लिनरी टीमों के समन्वय का परिणाम है। इससे दुर्लभ रोगों से प्रभावित मरीजों और उनके परिवारों में एक नई उम्मीद का संचार होगा।